परिचय

संदर्भ, पृष्‍ठभूमि और समस्‍याएं
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भारत में इंटरनेट

अमेरिका के इलिनॉय यूनिवर्सिटी-अरबाना स्‍थित नेशनल सेंटर फॉर सुपकंप्‍यूटिंग एजेंसी ने अप्रैल 1993 में दुनिया का सबसे पहला ग्राफिक इंटरनेट ब्राउजर पेश किया। इस ब्राउजर और इसके बाद पेश किए गए नेटस्‍केप ब्राउजर ने यह दिखा दिया कि इंटरनेट का उपयोग करने के लिए तकनीकी जानकारियों की कोई जरूरत नहीं है। इसने इंटरनेट की तरफ आम लोगों का ध्‍यान खींचा और इसके उपयोग और लोगों की जीवनशैली को हमेशा के लिए बदल दिया। हालांकि, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक गतिविधियों में इंटरनेट की केंद्रीकृत व्‍यवस्‍था जल्‍द ही नजर आने लगी।

लेकिन इसी के परिणामस्‍वरूप वह तबका हाशिए पर आने लगा, जिनकी या तो इंटरनेट तक पहुंच नहीं थी या वे इस साधन का सीमित उपयोग करने की क्षमता रखते थे। दो साल के भीतर अमेरिका के राष्‍ट्रीय दूरसंचार और सूचना प्रशासन (एनटीआईए) ने एक रिपोर्ट पेश की, जिसका शीर्षक था, इंटरनेट का प्रभाव : शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट विहीन परिवारों का सर्वेक्षण (अमेरिकी वाणिज्‍य विभाग और एनटीआईए 1995)। इस रिपोर्ट में डिजिटल असमानता और इंटरनेट तक लोगों की पहुंच न हो पाने का मतलब बताते हुए कहा गया, जबकि एक टेलीफोन का तार किसी व्‍यक्‍ति के लिए सूचना युग तक पहुंचने का रास्‍ता है, वहीं कंप्‍यूटर और मॉडम तेजी से किसी गुंबद की चाबी बनते जा रहे हैं।

उसी साल 1995 में भारत की इंटरनेट तक पहुंच मुमकिन हुई। शुरुआत में इंटरनेट केवल शैक्षणिक और तकनीकी संस्‍थाओं तक ही सीमित रहा, लेकिन अगस्‍त में स्‍वतंत्रता दिवस से कुछ पहले उस समय की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई विदेश संचार निगम लिमिटेड ने देश की पहली इंटरनेट सेवा का उद्धाटन किया। आम लोगों के लिए डायल अप कनेक्‍शन के बतौर गेटवे इंटरनेट एक्‍सेस सेवा 9.6 केबीपीएस की रफ्तार से सालाना 250 घंटे की उपयोग सीमा पर 5000 रुपए में उपलब्‍ध कराई गई।

1995 में भारत में 10 हजार इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो सितंबर 2014 में (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ट्राई के आंकड़े) बढ़कर 25 करोड़ से अधिक हो गए। इस तरह भारत दूरसंचार क्रांति का गवाह बन गया, जिसके पीछे मुख्‍य रूप से वायरलैस यानी बेतार तकनीक का प्रमुख योगदान रहा। मोबाइल टेलीफोन तकनीक और स्‍मार्टफोन और मोबाइल इंटरनेट की कीमतों में गिरावट ने इसमें अहम भूमिका निभाई। अब देश में 100 रुपए खर्च करने पर एक माह के लिए 300 एमबी इंटरनेट डाटा खरीदा जा सकता है।

कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में भारत का स्‍थान दुनिया में दूसरा है। इस प्रभावशाली आंकड़़े के बावजूद भारत में इंटरनेट की पहुंच केवल 15.1 प्रतिशत जनसंख्‍या (आइसलैंड 96.5%, ब्रिटेन 89.8%, चीन 46% और भूटान 29.9% के मुकाबले) तक ही है (अंतरराष्‍ट्रीय टेलीकॉम यूनियन, यूनेस्‍को – 2014 पेज 102)। अगर ब्रिक्‍स देशों से तुलना की जाए तो भारत का स्‍थान सबसे नीचे है।

टेबल 1.1

  (इंटरनेट की जनसंख्‍या तक पहुंच, स्रोत : आईटीयू 2014)

टेबल 1.2

(इंटरनेट की जनसंख्‍या तक पहुंच, स्रोत : आईटीयू 2014)

भारत में इंटरनेट तक लोगों की पहुंच का बारीक अंदाजा टेबल 1.3 से होता है, जिसमें ट्राई के उस आंकड़े के साथ बहुत बेरंग तस्‍वीर पेश की गई है, जिसमें कहा गया है कि देश में 17.8 करोड़ से ज्‍यादा लोग नैरोबैंड इंटरनेट का उपयोग करते हैं। ब्रॉडबैंड (512 केबीपीएस से ज्‍यादा तेज गति वाले इंटरनेट, जो कि अब भारत में एक उपयोगी इंटरनेट कनेक्‍शन की पहचान बन गया है) का उपयोग करने वालों की संख्‍या 7.5 करोड़ से कुछ ज्‍यादा ही है।

टेबल 1.3

Source: TRAI, September 2014

इन आंकड़ों को देखते हुए भारत में इंटरनेट की घुसपैठ प्रति 100 लोगों में 6.19 लोगों तक ही हो पाई है। अगर केवल वायरलाइन इंटरनेट कनेक्‍शन धारकों की संख्‍या 1.87 करोड़ को ही देखा जाए (ट्राई के मुताबिक केवल वायरलाइन कनेक्‍शन धारकों के लिए ही ब्रॉडबैंड की वांछित गति की उम्‍मीद की जा सकती है) तो प्रति 100 की जनसंख्‍या में दो लोगों से भी कम के पास ब्रॉडबैंड उपलब्‍ध है (2011 की जनगणना में बताई गई जनसंख्‍या के आधार पर)। डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस को सरकार से मिल रहे व्‍यापक समर्थन को भी इंटरनेट तक पहुंच के इन्‍हीं आंकड़ों के परिप्रेक्ष्‍य में देखा जाना चाहिए। केंद्र सरकार का डिजिटल इंडिया कार्यक्रम 2014 में शुरू हुआ और इसके केंद्र में देश के हरेक नागरिक तक 1) डिजिटल ढांचा उपलब्‍ध कराने 2) प्रशासनिक सेवाओं को मोबाइल और ऑनलाइन प्‍लैटफॉर्म पर उपलब्‍ध कराने और 3) नागरिकों को डिजिटल तकनीक के प्रति सशक्‍तिकरण करने के साथ डिजिटल साक्षरता को सर्वव्‍यापी करने और सहभागितापूर्ण प्रशासन के लिए डिजिटल प्‍लैटफॉर्म के उपयोग को प्रमुखता दी गई है। अब जबकि सरकारी सेवाओं को ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्‍या में ऑनलाइन किया जा रहा है, लोगों तक इंटरनेट की पहुंच न बनने से इन सेवाओं के उपयोग में भी बाधा आ रही है। पुणे के एक उदाहरण को ही देखें। सरकार ने हाल ही में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के परिवारों के लिए प्राथमिक शालाओं में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 25 प्रतिशत आरक्षण की व्‍यवस्‍था की है। इसके लिए केवल ऑनलाइन माध्‍यम से ही आवेदन किया जा सकता है। योजना के पहले साल ज्‍यादातर मां-बाप को यह पता नहीं था कि ऑनलाइन आवेदन कैसे किया जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि आरक्षण का पूरा कोटा नहीं भर पाया। दूसरे साल ऑनलाइन आवेदनों ने तब रफ्तार पकड़ी, जब स्‍कूलों ने लोगों की उलझन को दूर करने के लिए हेल्‍प डेस्‍क बनाया, जिसकी मदद से मां-बाप अपने बच्‍चों के दाखिले का आवेदन इंटरनेट से कर पाए।

सूचना और संचार तकनीक तक पहुंच अगर समानता लिए हो तो उससे न केवल राजनीतिक सहभागिता को बढ़ावा मिलता है, बल्‍कि यह आर्थिक समावेश, शिक्षा और समुदाय की प्रतिभागिता के साथ ही मनोरंजन और व्‍यक्‍तिगत वार्तालाप में भी इजाफा करता है। ऐसे में डिजिटल समानता सार्वजनिक नीति का एक अहम विषय है। लेकिन पहुंच के मसले को सुलझाने में भेदभाव का नतीजा समाज में पहले ही संपन्‍न वर्गों के इंटरनेट उपयोग के मामले में भी आगे बढ़ जाने और हाशिए पर खड़े उन लाखों लोगों के, जिन्‍हें समाजशास्‍त्रियों और डिजिटल मीडिया के सिद्धांतकारों ने अंतरराष्‍ट्रीय पूंजीवाद के काले धब्‍बे बताया है, पिछड़ेपन के रूप में देखा जा सकता है (कैस्टल्स, १९९८, पृ. १६२)।

डिजिटल असमानता और भेदभाव की परिभाषा

प्रारंभ में डिजिटल असमानता को इंटरनेट तक पहुंच के रूप में परिभाषित किया गया था, यानी जिनके पास तकनीक उपलब्‍ध है और जिनके पास उपलब्‍ध नहीं है और यह फर्क कंप्‍यूटर/ मोबाइल उपकरणों से लेकर इंटरनेट तक पहुंच के रूप में देखा जाता है। लेकिन मौजूदा सूचनाक्रांति के समय में डिजिटल साधनों तक पहुंच, उनके उपयोग का कौशल/साक्षरता और क्षमता का होना आय, शिक्षा, सामाजिक स्‍तर में बढ़ोतरी करने और सामाजिक सहभागिता व समावेश में वृद्धि करने के जरूरी है।

डिजिटल असमानता हमारे समाज में व्‍याप्‍त असमानता से भी जुड़ी हुई है। यह मौजूदा सामाजिक और आर्थिक दरार को बढ़ाती है। आय, शिक्षा, लिंग, उम्र और जातीयता के मामले में पहले से ही हाशिए पर खड़े समुदाय के पास कंप्‍यूटर और इंटरनेट तक पहुंच बनाने और उनके उपयोग के बहुत कम अवसर होंगे। (वॉशॉवेर 2003) इसका मतलब है कि नई तकनीक मौजूदा असमानता को कम करने के बजाय उसे और गहरा करेगी। (डी मैगियो और हार्जीताई 2001) सूचना प्राप्‍ति के मामले में गरीब समुदाय उस सामाजिक व्‍यवस्‍था में और भी पिछड़ सकता है, जहां कंप्‍यूटर में दक्षता को आर्थिक प्रगति, व्‍यक्‍तिगत उन्‍नति, बेहतर करिअर, शैक्षणिक अवसरों, सामाजिक समूहों तक पहुंचने और नागरिक प्रतिभागिता के अवसर प्राप्‍त करने का पर्याय माना गया है।

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के पूर्व महासचिव कोफी अन्‍नान इस समस्‍या को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाने वाले पहले व्‍यक्‍ति थे। उन्‍होंने कहा, ‘लोगों के पास कई चीजें नहीं हैं। रोजगार, आवास, भोजन, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं और पीने का पानी। अब उन्‍हें संचार की बुनियादी सुविधाओं से भी काट देना उस मुश्‍किल में लाने जैसा होगा, जो उनके लिए अन्‍य वंचितपन की तरह ही गंभीर होगी और इससे उनके लिए समाधान निकालने की गुंजाइश भी कम हो जाएगी।’ (नॉरिस में 2001 को कही गई बात का अंश, पेज 40)

इंटरनेट की बढ़ती सेंध के साथ डिजिटल असमानता की बात केवल पहुंच तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्‍कि यह उन लोगों के बीच असमानता की बात भी है, जिनकी इंटरनेट तक पहुंच है। डिजिटल साधनों तक पहुंच से पूरी तरह से बहिष्‍कृत तबका अब भी अहम है (वान डिक 2012), लेकिन हमारा ध्‍यान इन साधनों तक थोड़ी या कुछ ज्‍यादा पहुंच रखने वाले तबके के बीच के अंतर की ओर ज्‍यादा झुका दिख रहा है।

जैसे-जैसे सूचना-संचार के एक स्रोत की तकनीकी असमानता कम होती दिखेगी, एक और असमानता सिर उठा लेगी और इसे तेज गति की ब्रॉडबैंड सेवाओं तक पहुंच में अंतर के रूप में देख सकते हैं (कैसल्‍स 2001, पेज 256)। यहां तक कि जब लोगों की भीड़ को आखिर बुनियादी इंटरनेट सेवाओं तक पहुंच संभव हो जाए, तब तक तो वैश्‍विक संभ्रांत लोग सायबर दुनिया के और ऊंचे छोर तक पहुंच चुके होंगे।

हार्गिताई ने इसे ही डिजिटल असमानता का दूसरा स्‍वरूप करार दिया है। वे कहते हैं कि डिजिटल असमानता के मसले पर जरूरत उपयोगकर्ता की पहुंच के बजाय उसकी क्षमता पर गौर करने की है। किसी देश में जैसे-जैसे उपयोगकर्ताओं की संख्‍या बढ़ती है, पहुंच का मामला समाज के सबसे संपन्‍न तबके के पास से निकलकर उस व्‍यक्‍ति तक आ जाता है, जिसके पास अधिकार तो है पर सीमित मात्रा में और दूसरों के मुकाबले कम। (डिमैगियो और हार्गिताई 2001)

अब जबकि इंटरनेट का प्रसार देश में तेजी से बढ़ रहा है, पहुंच की गुणवत्‍ता और इंटरनेट का पूरा उपयोग कर पाने की क्षमता अहम हो गई है। ऐसे में इंटरनेट की पहुंच को व्‍यापक संदर्भ में देखने के लिए हमें इसे केवल एक तकनीक के बजाय डिजिटल असमानता को गहराई से समझना होगा, जिससे वंचितों को कनेक्‍टिविटी मिले। इस मामले में कुछ अन्‍य बातें इंटरनेट तकनीक के उपयोग के कौशल, उपयोगकर्ता के द्वारा प्राप्‍त किए जा सकने वाले सामाजिक समर्थन, उपयोग के प्रयोजन और वेबसाइटों तक पहुंच पाने की एक समान स्‍वतंत्रता से जुड़ी हैं। (डिमैगियो और हार्गिताई 2001))

इस खाई या असमानता को दूर करने के प्रयासों को डिजिटल समावेश का नाम दिया गया है।

डिजिटल समावेश

भारत में डिजिटल समावेश को लेकर अकादमिक और लोक नीति के क्षेत्र में कम काम हुआ है। ट्राई ने 2014 में नई ब्रॉडबैंड नीति पर एक परिचर्चा आयोजित की थी, जिसमें ब्रॉडबैंड की स्‍वीकार्यता के मामले में मांग से जुड़े मुद्दों को स्‍थान दिया गया था। पूरे समय सरकार का ध्‍यान तकनीकी या आपूर्ति तक पहुंच सुनिश्‍चित करने का रहा और वह भी टेलीफोनी के क्षेत्र में। यूनिवर्सल सर्विसेज ऑब्‍लिगेशन फंड (यूएसओएफ) में ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड सेवाओं को पहुंचाने की योजना 2009 से जारी है और 2014 में देश की ग्राम पंचायतों को राष्‍ट्रीय ऑप्‍टिकल फाइबर नेटवर्क के माध्‍यम से कनेक्‍टिविटी देने के बारे में समझौते पर दस्‍तखत किए गए। जहां तक डिजिटल इंडिया की बात है तो इसे केंद्र सरकार की तमाम पहल को एक ही छत के नीचे लाने का प्रयास माना जाना चाहिए, जिसमें डिजिटल समावेश को लेकर किए गए कुछ प्रावधान भी शामिल हैं। फिर भी सरकार का ध्‍यान ग्रामीण भारत को जोड़ने की तरफ ही है।

डिजिटल समावेश को लेकर शोध में कमी के पीछे यह धारणा भी जिम्‍मेदार हो सकती है, जो हाल में उभरी है कि एक विकासशील देश में परंपरागत सामाजिक असमानताओं की तुलना में डिजिटल असमानता को दूर करना कम जरूरी है। गरीबों के लिए सूचना-संचार तकनीक शौचालय और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं से कम जरूरी हो सकती है। भारत में सूचना तकनीक और इसके सार्वभौमिक फायदों को लेकर एक विश्‍वास है और इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। ‘सामान्‍यीकरण के सिद्धांत’ (नॉरिस 2001) में भी इस मान्‍यता को स्‍वीकार किया गया है कि बाजार में प्रतिस्‍पर्धा और हार्डवेयर/ सेवाओं की दरों में कमी से कई असमानताएं सरकार के हस्‍तक्षेप या सबको पहुंच का एक समान मौका देने की पहल के बिना भी सुधर सकती हैं। इंटरनेट पर ऑनलाइन समुदाय का सामाजिक नक्‍शा समय के साथ विस्‍तृत होता है, ठीक वैसे जैसे टेलीविजन या टेलीफोन के श्रोता बढ़ जाते हैं।

लेकिन तकनीकी प्रसार का इतिहास इस विचार को दबा देता है कि बारूद से लेकर टेलीग्राफ और वायुयान तक तकनीकी खोज को आर्थिक रूप से मजबूत तबके ने ही सबसे पहले अपनाया है। शिक्षा, साक्षरता और सामाजिक स्‍तर ही आर्थिक और सूचनाप्रद संसाधनों तक पहुंच कायम करती है और नई अभिनव तकनीकों के लिए लचीलापन अपनाने के लिए ये जरूरी भी हैं। वे परिस्‍थितियां, जिनके कारण आविष्‍कार किए जाते हैं कुछ मायनों में उनके सामाजिक परिणामों के भी निर्धारक होते हैं। अत्‍यधिक विभाजित किसी समाज में नवाचार उसकी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को और बढ़ाने वाले साबित होते हैं। (नॉरिस 2001, पेज71)

जैसा कि कैसल्‍स लिखते हैं, ‘इंटरनेट का प्रसार या स्‍कूलों में ज्‍यादा कंप्‍यूटर रखने से कुछ खास सामाजिक बदलाव देखने को नहीं मिलते।’ यह बात निर्भर करती है कि ये कहां रखे हैं, किनके लिए, किनके द्वारा और किस सूचना-संचार तकनीक का इस्‍तेमाल करने वाले हैं। (कैसल्‍स, 2005, पेज 6)

डिजिटल समावेश इसके बाद डिजिटल सशक्‍तिकरण की मांग करता है। डिजिटल साधनों के उपयोग के अवसरों, डिजिटल समानता और डिजिटल उत्‍कृष्‍ठता की भी मांग करता है। लोग एक बेहद बुनियादी उपयोगकर्ता के रूप में डिजिटल साधनों का इस्‍तेमाल शुरू कर सकते हैं, जिन्‍हें सामुदायिक तकनीक केंद्र या लाइब्रेरी में इस तकनीक तक पहुंच बनाने की जरूरत हो। डिजिटल सशक्‍तिकरण का मतलब कंप्‍यूटर और इंटरनेट के उपयोग की आर्थिक क्षमता से है, जो सीखने, एक-दूसरे से संपर्क साधने, नवाचार और अपनी आय को बढ़ाने में उपयोग किया जा सकता है। इससे डिजिटल साधनों के उपयोग के मामले में एक नौसिखिया भी एक इस तकनीक में पेशेवर या नव परिवर्तक हो सकता है। डिजिटल तकनीक को समावेशी बनाने की रणनीति वही हो सकती है, जो एक डिजिटल समाज को पूर्ण सहभागिता की राह दिखाए। (केसेन आर्चर, पेरी इन वेन, पेरी एंड कूपर, 2009)  

डिजिटल असमानता का मापन

साल 2000 के प्रारंभ में अमेरिका की एनटीआईए ने जाति, आय, शिक्षा, उम्र और विकलांगत की स्‍थिति के आधार पर नई श्रेणियों में इंटरनेट सुविधा प्राप्‍त और अप्राप्‍त परिवारों के बारे में अलग से रिपोर्ट तैयार करनी शुरू की। भारत में इंटरनेट आने के 20 साल बाद, देश में डिजिटल असमानता को लेकर बहुत कम अध्‍ययन हुए हैं। इस मुद्दे पर भी कि जिन तबकों तक इंटरनेट की पहुंच नहीं है, या फिर कंप्‍यूटर तकनीक में जिनका कौशल ज्‍यादा नहीं है, उनके लिए जानकारी का अभाव किस तरह से इस असमानता की खाई को और विस्‍तृत कर रहा है। हमारे पास उन समूहों के बारे में भी बहुत कम आंकड़े हैं, जिन्‍हें सूचनाप्रद समाज से अछूता रखा गया है या फिर इससे शून्‍य से बाहर निकलने की उनकी इच्‍छाएं किस तरह की हैं। अभी तक जो शैक्षणिक या नीतिगत शोध हुए हैं, वे मुख्‍यत: ई-गवर्नेंस, डिजिटल समावेश की तरह व्‍यक्‍ति के प्रयासों और ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्‍टिविटी को लेकर आ रहीं समस्‍याओं पर केंद्रित हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के (TRAI) आंकड़े इंटरनेट और टेलीफोन के उपयोग के बीच के फासले की ओर इशारा करते हैं, लेकिन इनमें इंटरनेट का उपयोग न करने वाले और इसमें पिछड़े लोगों को इस साधन का इस्‍तेमाल करने में पेश आ रहीं रुकावटों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता। (मैक्‍किन्‍से एंड कंपनी, 2014) हाशिए पर खड़े देश के शहरी समुदाय पर डिजिटल असमानता के प्रभाव को जानने के आंकड़ों की खासतौर पर कमी है।

यह शोध इन कमियों को कुछ हद तक दूर करने का प्रयास करता है। शोध में इस बात की खोज करने का प्रयास है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ी शहरी जनसंख्‍या तेजी से बढ़ती देश की महानगरीय आबादी के बीच कितना ऑनलाइन हो पाई है, डिजिटल तकनीक में उनके समावेश में किस तरह की रुकावटें हैं और संसाधनों की कमी से जूझ रहे उनके रहवासी इलाकों में वे किस तरह की परेशानी महसूस करते हैं, इंटरनेट का उनका उपयोग किस तरह का है और ऑनलाइन होने की उनकी अपेक्षाएं कैसी हैं।

यह अध्‍ययन ‘पहुंच’ को सामाजिक और तकनीकी संदर्भ में परिभाषित करता है। चूंकि इंटरनेट तकनीक समाज के भीतर तक सेंध लगाती है, ऐसे में सवाल यह नहीं है कि कितने लोग और कौन अपने घर, कार्यस्‍थल या सार्वजनिक केंद्र से इंटरनेट चलाता है, बल्‍कि अहम बात यह है कि उनके लिए ऑनलाइन होना कितना मुश्‍किल है और ऑनलाइन होने के बाद वे क्‍या करते हैं।

पुणे शहर और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्र इंटरनेट तक पहुंच में असमानता को समझने की उर्वर जमीन उपलब्‍ध कराते हैं। पिछले दो दशकों में पुणे शहर तेजी से विकसित हुआ है और अब यह भारत का आठवां सबसे बड़ा शहर बन चुका है। शहर में बाहर से आकर बसे लोगों की संख्‍या बहुत ज्‍यादा है, लेकिन तेजी से बढ़ती शहर की आबादी का 40 प्रतिशत हिस्‍सा (पड़ोस के पिंपरी-चिंचवाड़ औद्योगिक क्षेत्र से थोड़ा कम) अभी भी बहुआयामी गरीबी के बीच झोंपड़ियों में रहता है। सॉफ्टवेयर निर्यात के मामले में पुणे 2015 तक बेंगलुरू के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर हो जाएगा। शहर की खूबसूरती के केंद्र बिंदु बन रहे अत्‍याधुनिक सॉफ्टवेयर पार्क और आईटी एन्‍क्‍लेव सूचना-प्रौद्योगिकी में दक्ष युवाओं को आकर्षित करते हैं। सरकारी सेवाओं की संख्‍या में तेजी से हो रही बढ़ोतरी सभी नागरिकों को प्रभावित करती है, जिसमें गरीब भी शामिल हैं। जाति प्रमाण पत्र से लेकर ड्रायविंग लाइसेंस तक के लिए ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है। लेकिन इस आईटी सिटी में इंटरनेट तक पहुंच और उपयोग में पेश आने वाली रुकावटों के बारे में यह पहला शोध दस्‍तावेज है, जहां इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्‍या एक अध्‍ययन (भारत में इंटरनेट -2014, आईएएमएआई-आईएमआरबी, 2014) के मुताबिक 2013-14 में 34 फीसदी बढ़कर पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में 36 लाख हो गई है (यह दर्शाता है कि इंटरनेट पहुंच की दर 50 प्रतिशत है)।

इस अध्‍ययन के प्रमुख उद्देश्‍य इस प्रकार हैं:

  1. पुणे शहर में नगर निगम और पिंपरी-चिंचवाड़ महानगर पालिका के अंतर्गत आने वाली निम्‍न आय वर्गीय बस्‍तियों में इंटरनेट की पहुंच में असमानता को समझना।
  2. यह समझना कि संपत्‍ति, शिक्षा, भाषा, धर्म, जाति, लिंग, आयु, रोजगार और वैवाहिक स्‍थिति जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक किस तरह इन बस्‍तियों में रहने वाले परिवारों की इंटरनेट तक पहुंच को किस तरह प्रभावित करते या नहीं करते हैं।
  3. इस बात को समझना कि कंप्‍यूटर हार्डवेयर/ उपकरण, कनेक्‍टिविटी/ डाटा सेवाएं और इंटरनेट के सार्वजनिक उपयोग केंद्र जैसे ढांचागत साधन इन बस्‍तियों में रहने वाले लोगों की इंटरनेट तक पहुंच को किसी तरह आकार देते हैं।
  4. इन निम्‍न आय वर्ग की बस्‍तियों में लोगों की इंटरनेट के प्रति जागरूकता और व्‍यवहार का अध्‍ययन करना।
  5. लोगों के इंटरनेट इस्‍तेमाल के स्‍वरूप को समझना और यह जानना कि उनका इंटरनेट से परिचय कैसे हुआ और उन्‍होंने इंटरनेट को कैसे खोजा।
  6. लोगों तक इंटरनेट की गुणवत्‍तामूलक पहुंच का अध्‍ययन
  7. इन बस्‍तियों के लोगों की इंटरनेट तक पहुंच में सहयोगी और बाधक बन रहे कारणों को समझना और इंटरनेट से जुड़ने की उनकी अपेक्षाओं को जानना

इस तरह के अध्‍ययन की जरूरत थी। सरकार स्‍मार्ट सिटी, ई-गवर्नेंस और नागरिक सेवाओं को डिजिटल साधनों से उपलब्‍ध कराने की दिशा में महत्‍वाकांछी योजनाएं बना रही है। इस चरण में नीतिगत प्रक्रिया के दौरान ऐसे शोध के नतीजों के बिना डिजिटल असमानता को खत्‍म करने की कोशिशें जरूरत के मुताबिक अपर्याप्‍त साबित हो सकती हैं या फिर इन कोशिशों को बहुत कम और बहुत लेटलतीफ वाली कहा जा सकता है।

इसके अलावा, जब तक कि हमें समस्‍या की गंभीरता और इसके समाधान के अवसरों के बारे में मालूम न हो, हमें नीतिनिर्धारकों को यह बात समझाना मुश्‍किल होगा कि भोजन, आय और आवास पहले और  डिजिटल समावेश उसके बाद, ऐसा नहीं सोचा जा सकता है. जरूरी है। डिजिटल असमानता अपने आप में असमानताओं को बढ़ाती है, यह सुझाव देने के लिए हमें सालों तक एक और अध्‍ययन का इंतजार ना  करना पड़े। शोध का उद्देश्‍य केवल डिजिटल असमानता और इंटरनेट तक पहुंच रखने वाले लोगों के उपयोग के स्‍तर को समझना ही नहीं है, बल्‍कि यह जानना भी है कि लोग किस तरह की उम्‍मीदें और आकांक्षाएं इस तकनीक के उपयोग से रखते हैं। साथ ही उस रूपरेखा को भी जांचना है, जिसे वॉर्शावर (2003, पेज 26) ने तकनीक की सामाजिक अंत:स्‍थापना कहा था।  

Endnote

(1) This view was also expressed by some elected representatives and bureaucrats in the city in the course of this research.