निष्कर्ष

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वर्ष 2000 में दिल्ली स्थित एक झुग्गी क्षेत्र के बूथ में पांच कंप्यूटर 24 घंटे सप्ताह भर के लिए इंटरनेट से जुड़े और उनके मॉनीटरों को दीवार में छेद कर टांग दिया गया। ये कंप्यूटर वहां जॉय स्टिक और बटन के साथ वहां लगाए गए, जो कि की-बोर्ड और माउस के विकल्प थे। बच्चों ने इन कंप्यूटरों को बिना किसी प्रशिक्षक के चलाया। इस प्रक्रिया में बच्चे अपने स्तर पर अपनी गति से कंप्यूटर चलाना सीखे। वे अपने आप कंप्यूटर पर कट-पेस्ट करना, कंप्यूटर के प्रोग्राम्स चलाना एवं इंटरनेट का उपयोग करना सीख गए।

यह परियोजना ‘दीवार में छेद’ (होल इन द वॉल) के नाम से जानी गई और संगणकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में विश्वस्तर पर इसकी पहचान बनी। यह बात तुरंत प्रकट तौर पर दिखाई दी, जब कि ये बच्चे कंप्यूटर पर अपना ज़्यादातर समय कंप्यूटर गेम खेलने और चित्रकारी में बिता रहे थे। इंटरनेट पर उनका समय कम बीत रहा था, क्‍योंकि इंटरनेट कमज़ोर ढंग से काम कर रहा था, कंप्यूटर /इंटरनेट प्रशिक्षण का कोई अभ्यासक्रम उन्हें उपलŽध नहीं कराया गया था और उनके पास कंप्यूटर कंटेंट की कमी थी, क्‍योंकि बच्चे सिर्फ हिंदी ही जानते थे। वहां के स्थानीय समाज का इस कंप्यूटर केंद्र को चलाने में कोई जुड़ाव नहीं था। अभिभावकों ने इस प्रयोग को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए थे, क्‍योंकि इस प्रयोग का अर्थ बच्चों के मनोरंजन पर ही खत्म होता दिखाई दे रहा था (वॉरश्योर-2003)।

‘होल इन द वॉल’ ने इस बात को स्पष्ट किया कि असमानता को कम कर संगणकीकरण तकनीक पहुंचाने का मतलब केवल हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर उपलŽध कराना नहीं है। डिजिटल असमानता के अनेक जटिल कारण हैं, जिनमें भौतिक, डिजिटल, मानवीय, सामाजिक संसाधन एवं सामाजिक संबंध आदि कारण शामिल हैं। इस संदर्भ में तकनीकी से जुड़े पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

‘होल इन द वॉल’ से मिले सबक आज भारत में इंटरनेट उपयोग को शामिल करने के लक्ष्य की दिशा में सामयिक हैं, जब कि शासन, नीति निर्माता और दूरसंचार उद्योग इस पर सूक्ष्मता से काम कर रहा है एवं इंटरनेट उपयोग के साथ डिवाइस तथा डाटा कने€शनों की ग्राहक संख्या बढ़ती जा रही है।

यह अध्याय डिजिटल असमानता को समाप्त करने के लिए एक नई सोच की आवश्यकता को    प्रतिपादित करता है और कुछ सिफारिशें करता है, ताकि शहरी भारत के हाशिए पर पड़े कमज़ोर समुदाय इंटरनेट से जुड़ सकें।

तकनीक से आगे

‘इंटरनेट अब भारत के नाम के साथ जुड़ चुका है, जो कि उद्योग और समाज के लिए व्यापक तौर पर अच्छे भविष्य के संकेत दे रहा है। यह बात इंटरनेट एवं मोबाइल पर गुणवत्‍ता संवर्द्धित सेवाएं देने वाली प्रतिनिधि संस्था इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) ने सितंबर 2015 में कही है। आईएएमएआई ने बताया है कि 30 जून, 2015 तक भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 35.2 करोड़ तक पहुंच जाएगी, जो कि अमेरिका की आबादी से ज़्यादा होगी (पीटीआई 2015)। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की यह संख्‍या 2017 तक 50 करोड़ तक हो जाएगी (टेक डेस्क, 2015)।

इंटरनेट उपयोकर्ताओं के इन आंकड़ों और इंटरनेट से जुडऩे की आवश्यकता पर सवाल उठाने की ज़रूरत है। हमारा यह अध्ययन भारत के तेज़ी से बढ़ते महानगरों में डिजिटल असमानता की हदों पर प्रकाश डालता है और सच्चाई को परखता है। यह इंगित करता है कि शहरों में डिजिटल असमानता है। इस अध्ययन में यह तथ्य सामने आता है कि पुणे शहर के 10 में 5 निवासी, पूरी तरह से ऑनलाइन हैं, दूरसंचार क्षेत्र का अनुमान (आईएमआरबी-आईएएमएआई, 2014 मुंबई) और सर्वेक्षण के मुताबिक शहर के कम आमदनी वाले इलाकों में 10 में से 2 व्य€क्‍ति इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। इंटरनेट से जुड़े लोगों की कम संख्या तब है, जब कि इंटरनेट उपयोगकर्ता की परिभाषा में केवल उन्हें भी शामिल किया गया है, जो कि डाटा का इस्तेमाल किसी भी डिवाइस पर, कहीं भी पिछले तीन माह से उपयोग कर रहे हैं, न कि वे सिर्फ डाटा कने€शन उपभोक्‍ता हैं।

हमारा अध्ययन इंगित करता है कि डिजिटल असमानता को आर्थिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों ने कम आमदनी, संसाधनों की कमी से प्रभावित गरीब तबके और अशिक्षित विविध जमातों कैसे प्रभावित कर रहा है और इसमें सुधार के लिए €या किया जा सकता है।

  • ग्रामीण, आदिवासी अंचलों और झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में किए गए अध्ययन के अनुसार अधोसंरचना की कमी एवं अवरोध सामने आए हैं। यह देखा गया है कि इन झुग्गी इला$कों में नेटवर्क कने€क्‍टिविटी और कवरेज़ कमज़ोर है। इन क्षेत्रों में रहने वालों को वायर्ड ब्रॉडबैंड सेवाएं नहीं मिल रही हैं। सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क या ऐसे सामुदायिक केंद्र नहीं हैं, जहां से कि उन्हें इंटरनेट सुविधा मिल सके।
  • आर्थिक कमियों के चलते इंटरनेट सेवाएं न मिलने का सीधा संबंध है। ज़्यादा आमदनी वाले परिवारों की तुलना में कम आमदनी वाले परिवारों के इंटरनेट सुविधा से जुडऩे की संभावनाएं कम हैं। यदि आमदनी वर्ग को पांच भागों में बांटें, तो लगभग 55 प्रतिशत इंटरनेट उपभो€ता आमदनी के चौथे और पांचवें वर्ग से हैं, जो अच्छी आमदनी की वजह से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे परिवार, जो कंप्यूटर, डोंगल, स्मार्टफोन और अन्य प्रकार के फीचर फोन खरीद सकते हैं, वे ऑनलाइन हो सकने में आगे हैं। इंटरनेट रेडी डिवाइस की अनुपलŽधता एक प्रमुख अवरोध के रूप में सामने आती है, खासतौर से महिलाओं में, जो कि सामाजिक तौर पर उपेक्षित समुदायों की हैं और उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। अध्ययन क्षेत्रों में यह बात भी सामने आई है कि उपयोगकर्ताओं के सामने कंप्यूटर खरीदने के लिए पैसा नहीं होता है और जिनके पास कंप्यूटर है, उन्हें वायर्ड ब्रॉडबैंड कने€शन नहीं मिल पाते, भले ही उनके पास इसके लिए पैसे हों।
  • शिक्षा का भी इंटरनेट उपयोग के साथ सीधा एवं मज़बूत संबंध है। जिन लोगों की शिक्षा नहीं हुई है या जो केवल प्राथमिक कक्षा तक पढ़े हैं, उनमें इंटरनेट के प्रति बहुत ही कम रुझान देखा गया है। जिनके यहां एक या अधिक व्य€क्‍ति शालेय शिक्षा के अंतिम वर्ष में है या उसने /उन्होंने शालेय शिक्षा पूरी कर ली है, ऐसे परिवार इंटरनेट से जुडऩा चाहते हैं।
  • उपयोग के तरीकों से शिक्षा का मज़बूत संबंध: उच्चतर शिक्षा प्राप्त व्‍यक्‍ति इंटरनेट का इस्तेमाल मनोरंजन और सोशल नेटवर्किंग के लिए किए जाने की बात कहते हैं, जबकि सर्वेक्षण के कुछ अशिक्षित उत्‍तरदाता मुख्यत: इंटरनेट का इस्तेमाल मनोरंजन और सोशल नेटवर्किंग के लिए करते हैं, जिसका कि प्रबंधन ऑडियो-विजुअल के रूप में होता है और ऐसा कंटेंट लिखित आधारित (टे€स्ट बेस्ड) नहीं होता।
  • कंप्यूटर एवं डिजिटल डिवाइस को इस्तेमाल करने का कौशल न होने के कारण भी कई लोग उनका उपयोग नहीं कर पाते और कौशल का अभाव एक मुख्य अवरोध के रूप में सामने आया है। इनमें निर्धन, अत्यंत अल्प शिक्षित, बुज़ुर्ग नागरिक और महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें सूचना एवं संचार तकनीक कौशल (आईसीटी स्किल) प्राप्त नहीं हो सका है।
  • अध्ययन के अंतर्गत यह पाया गया कि पुरुष प्रधान वातावरण में भेदभाव झेल रही महिलाएं पुरुषों की तुलना में कंप्यूटर के मामले में पीछे हैं, क्‍योंकि उनके पास अपनी कंप्यूटर, मोबाइल फोन और इंटरनेट सुविध नहीं है। जो महिलाएं इंटरनेट का उपयोग कर रही हैं, उन्हें चाहे जब लॉग ऑन करने की स्वतंत्रता नहीं है। अधोसंरचनात्मक एवं आर्थिक अवरोध उन्हें बुरी तरह प्रभावित करते हैं,€क्‍योंकि न तो उनके पास आर्थिक पूंजी होती है, जिससे कि वे डिवाइसेस खरीद सकें एवं न ही उन्हें अपनी बस्ती से बाहर दुकानों पर जाकर डिवाइस खरीदने की स्वतंत्रता है।
  • एक अन्य अवरोध के रूप में उम्र भी मुख्य कारण है। इसमें 35 वर्ष से अधिक उम्र के मात्र 7 प्रतिशत उपयोगकर्ता सामने आए। इन्हीं में से कुछ उपयोगकर्ता ऐसे भी थे, जिनकी आजीविका सुनिश्चित थी।
  • अंतिम एवं खासतौर पर इस मामले में सामाजिक वातावरण एवं बर्ताव से संबंधित कारण सामने आए। कई ऐसे गैर-उपयोगकर्ता, जिन्हें कि अ€सर सूचनाओं का अभाव रहा है, विश्वास करते हैं कि कंप्यूटर एवं इंटरनेट से उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिलता, जिससे कि उनके प्रतिबंधित जीवन पर कोई खास असर पड़ता हो।

यह एक कुचक्र है।

सामाजिक असमानता संसाधनों का असमान वितरण कर रही है, जिसमें कि डिजिटल संसाधन भी शामिल है। अत: यह बात सामने आती है कि जिनके पास अत्यंत कम आमदनी, शिक्षा और स्वतंत्रता है, उनके पास डिजिटल तकनीक से जुडऩे के अवसर भी बेहद कम हैं। आधुनिक जीवनशैली के लिए ज़रूरी बन चुकी डिजिटल तकनीक से जुडऩे के अवसरों में कमी, उनके जीवन में सूचनाओं का अभाव पैदा कर रही है और इससे समाज असमान भागीदारी की ओर बढ़ रहा है। असमान भागीदारी ही सामाजिक असमानता बढ़ा रही है(वेनडिज़्क, 2013, पेज- 33)।

हमारे अध्ययन के दो वर्षों के दौरान हमने पाया कि इन बस्तियों में इंटरनेट का प्रचार बढ़ता जा रहा है। यहां इस शोध का बिंदु है- इंटरनेट की ज़्यादा पहुंच और इस्तेमाल डिजिटल असमानता को अपने आप नहीं सुधार सकेगा।

इंटरनेट उपयोग में अवरोध पर सीसीडीएस का सर्वेक्षण बताता है कि डिजिटल असमानता मुख्यत: दो स्तरों पर है-

  1. पहले स्तर पर डिजिटल बंटवारे में वे लोग हैं, जिनके पास इंटरनेट है या नहीं और वे उपयोगकर्ता हैं या नहीं।
  2. दूसरे स्तर पर डिजिटल बंटवारे को सक्षमता बंटवारा भी कहा जा सकता है, जो कि उपयोगकर्ताओं को प्रभावित करता है, किंतु इसमें कौशल का भेदभाव एवं इंटरनेट एप्लीकेशन का इस्तेमाल शामिल नहीं है।

डिजिटल असमानता के पहले स्तर में वे लोग हैं, जो मुख्यत: इंटरनेट के बारे में जानकारी नहीं रखते और उनके पास कंप्यूटर मोबाइल जैसी तकनीकी पूंजी नहीं है। उनकी बस्तियों में कोई ऐसा केंद्र भी नहीं है, जहां वे डिजिटल तकनीक से जुड़ सकें। आर्थिक अवरोधों के कारण वे हार्डवेयर और डाटा सर्विस नहीं पा सकते। उनमें कंप्यूटर कौशल का अभाव है, क्‍योंकि वे शिक्षित नहीं हैं तथा उन्हें आईसीटी प्रशिक्षण एवं सहायता नहीं मिल पाई है। साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक अवरोध भी हैं, जिन्होंने महिलाओं को इस तकनीक से जुडऩे के मामलों में मर्यादित किया है।

इनमें सक्षमता बंटवारा ज़्यादा जटिल है और जिसे अक्‍सर अनदेखा किया जाता है।

हमारे अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के पास डिजिटल उपकरणों को चलाने का कौशल है और वे सस्ते मोबाइल फोन के द्वारा, साइबर कैफे तथा काम के अन्य स्थानों पर जाकर ज़्यादातर इंटरनेट का उपयोग मनोरंजन और सोशल नेटवर्किंग के लिए करते हैं। ये लोग शिक्षा से संबंधित जानकारी निकालने, नौकरी ढूंढ़ने और आवेदन करने या सरकारी नौकरी के अवसर ढूंढ़ने के लिए इंटरनेट का उपयोग कम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट उपयोग के मामले में पर्याप्त सुविधा नहीं मिलती। उन्हें सामाजिक तौर पर भी इस तकनीक के इस्तेमाल और कोई तकनीकी समस्या आने पर सामाजिक मदद भी नहीं मिलती है। सामाजिक सहयोग के अभाव में उनके लिए इंटरनेट सीखना एवं उसका उपयोग करना मुश्किल हो जाता है, जो कि मनोरंजन, सोशल नेटवर्किंग एवं साधारण उपयोग से कहीं कमतर है।

ये भारत के वे भावी उपयोगकर्ता हैं, जिन्हें दूरसंचार उपकरण निर्माताओं एवं सेवा प्रदाताओं से सस्ती दरों के प्रस्तावों और ई-बिजनेस संस्थानों से आक्रामक मार्केटिंग की ज़रूरत है।

टेलीकॉम कंपनियां फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियों के साथ समझौते कर रही हैं और मोबाइल उपभो€ताओं को विभिन्न प्रकार के एप और इंटरनेट सेवाओं के प्रस्ताव दे रही हैं। यूं तो तकनीकी तौर पर ये उपयोगकर्ता इंटरनेट से जुड़े हैं और उनके पास पर्याप्त सूचनाएं भी हैं, किंतु ऐसे लाभार्थियों को इंटरनेट क्रांति के मिले लाभ बहस के योग्य है। इन लोगों को अभावग्रस्त कहना ज़्यादा उचित होगा। इन्हें चीन में सबसे पहली बार कम आमदनी वाले, जगह बदलने वाले कामकाजी या बेरोज़गार आबादी के रूप में संबोधित किया गया था (कार्टियर एट एल 2005)। ये इंटरनेट उपभो€ता भले ही इंटरनेट पर हर हफ्ते मनोरंजन और सोशल नेटवर्किंग के लिए कई घंटे गुज़ारते हों, लेकिन उन्हें ब्राउसरों, ई-मेल खातों या इंटरनेट के अन्य विभिन्न उपयोगों के बारे में ज्ञान नहीं है। कीयू (एक चीनी सरनेम), जिसने कि पहली बार ‘अभावग्रस्त’ शब्द का प्रयोग किया था, का विश्वास था कि एक अभावग्रस्तों की तुलना संपन्न लोगों से करना एक बड़ी भूल होगी (€कीयू, 2009)।

किसी भी दीर्घकालीन और अर्थपूर्ण डिजिटल इन्€ल्यूजन नीति के लिए यह ज़रूरी है कि वह सभी को इंटरनेट के इस्तेमाल के अवसर बराबरी से उपलŽध कराने को लक्ष्य करे।

डिजिटल समावेश की नीति

डिजिटल समावेश की नीति सामान्यत: तकनीक के बढ़ते असमान उपयोग पर केंद्रित है। किंतु यदि सूचना एवं संचार तकनीक (आईसीटी) को लोगों को सक्षम बनाने के एक हथियार और बंटे हुए समाज के पुल के रूप में देखें, तो डिजिटल समावेश की नीति को कंप्यूटर एवं इंटरनेट के उपयोग के अवसर एवं उसे स्वीकार करने के मुद्दों पर संगठित करना होगा (बेकर एट एल, 2012, पेज 9)।

‘डिजिटल जीवन के लाभ और अवसर समुदाय को दिलाने के लिए ज़रूरी है कि कंप्यूटर उपयोग के लिए अधोसंरचना पर ध्यान दिया जाए। कंप्यूटर की स्वीकार्यता लोगों के ब्रॉडबैंड तकनीक के उपयोग में अवरोधों को हटाने में मदद करती है। तब भी, जब उन्हें कंप्यूटर उपयोग के अवसर उपलŽध हों। अंतत: हम कह सकते हैं कि कंप्यूटर के उपयोग के सिद्धांत कुछ विशिष्ट उद्देश्यों पर केंद्रित होते हैं, जबकि सोच-समझकर लाई गई ब्रॉडबैंड तकनीक आर्थिक सफलताओं के अवसरों को समुदायों एवं निवासियों में बढ़ा देती है।

जबकि समाज में समानता का रुझान बनाने वाले केंद्रों के प्रयास ये होते हैं कि लोग डिजिटल उपकरणों का वास्तविक रूप से उपयोग करें। लेकिन सभी को बराबरी का हक दिलाने के प्रयोगों से इस बात को बढ़ावा मिलने के आसार दिखते हैं कि कंप्यूटर उपयोगकर्ता, खासतौर से निर्धन तबका विभिन्न सूचनाओं को ऑनलाइन प्राप्त कर सके, ताकि उनकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी बेहतर बने। उदाहरण के लिए कंप्यूटर उपयोग के लिए समानता लाने के लिए किए जा रहे प्रयासों में इस बात के लिए समाधान परिलक्षित हों कि सभी सामुदायिक केंद्रों और सामुदायिक शालाओं में कंप्यूटर उपलŽब्ध हैं, किंतु सभी को बराबरी का हक दिलाने के प्रयासों में आम लोगों की जागरूकता बढ़ाने, सूचनाओं की जानकारी बढ़ाने और आवश्यकता पडऩे पर वेबसाइट से जानकारी प्राप्त करने की योग्यता पैदा करने पर ज़ोर दिया जाता है (गोमेज़, 2015)।

भारत में जहां यह सर्वेक्षण किया गया है, यह बात सामने आई है कि तकनीक का वास्तविक उपयोग एक बड़ा अवरोध है। हमें ज़रूरत है कि कंप्यूटर के समान उपयोग के अवसर बनाने तथा इसके लिए समुदाय में बराबरी से रुझान पैदा करने के लिए संयु€क्त नीति बनाएं।

भारत में डिजिटल असमानता को खत्म करने के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं है, किंतु केंद्र सरकार का डिजिटल इंडिया प्रोग्राम आश्वस्त करता है कि डिजिटल इन्फ्रास्ट्र€चर को प्रत्येक नागरिक, प्रशासन एवं सेवा प्रदाताओं को मांग पर बतौर उपयोगिता के उपलब्‍ध कराया जाएगा, ताकि नागरिकों का डिजिटल सशक्‍तिकरण हो सके (कुमार, 2015)। साथ ही सरकार ने अपनी घोषणा में यह भी कहा है कि कंप्यूटर तक पहुंच और उपयोग (ए€क्सेस) और उसकी स्वीकार्यता (एडॉप्शन) दोनों से ही जुड़े मुद्दों पर उसकी निगाह है।

उपयोग के मामले में डिजिटल इंडिया कार्यक्रम, ग्रामीण भारत की 2 लाख 50 हज़ार ग्राम पंचायतों (यूनिवर्सल सर्विस ऑŽब्‍लिगेशन फंड से अनुदानित) में वायर्ड ब्रॉडबैंड कनेक्‍शन देने, 42 हज़ार 300 गांवों में मोबाइल कनेक्‍टिविटी, सभी गांवों में इंटरनेट से जुड़े सामुदायिक सेवा केंद्र एवं 1 लाख 50 हज़ार डाकघरों का मल्टी सर्विस सेंटर के रूप में रूपांतरण के लक्ष्य को आश्वस्त करता है (ठाकोर, 2015)।

शहरी भारत के लिए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत 10 लाख से ज़्यादा आबादी वाले शहरों तथा पर्यटन स्थलों पर वाई-वाई केंद्र स्थापित करने, सभी नए निर्माण स्थलों एवं नई शहरी आबादियों तक संचार सुविधाएं देने, सस्ती दरों पर संचार सेवाओं के लिए वर्चुअल नेटवर्क ऑपरेटरों को लाइसेंस देने तथा दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक ब्रॉडबैंड सेवाएं पहुंचाने के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।

राजकीय नीति में कम आमदनी वाले रिहायशी क्षेत्र तथा झुग्गी इलाकों सहित ऐसे क्षेत्र जहां कि अपर्याप्त सुविधाएं हैं या जो कि उपेक्षित शहरी इलाके हैं, वहां अधोसंरचना उपलŽब्ध कराने को लेकर कोई उल्लेख नहीं है। जबकि कम आमदनी उपभो€क्‍ताओं के लिए दूरसंचार सेवाओं के विस्तार के मामले में निजीकरण  एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारा अध्ययन कहता है कि ऐसे लोगों को इंटरनेट सुविधाएं ठीक से नहीं मिलतीं। कमज़ोर गुणवत्‍ता की सेवाएं इंटरनेट के उपयोग के तरीकों को मर्यादित भी करती हैं। इंटरनेट के उपयोग के विभिन्न सघन तरीकों के मामले में पूछने पर उत्‍तरदाताओं ने बताया कि शैक्षणिक संस्थानों एवं नौकरी के लिए आवेदन-पत्रों को भरना एवं भेजना, सरकारी प्रयोजनों के लिए आवेदन करना आदि आज भी व्यावसायिक तौर पर चल रहे सायबर कैफे पर ही ज़्यादातर निर्भर हैं। अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि सार्वजनिक पुस्तकालयों एवं अन्य सामुदायिक केंद्रों पर लोगों को नि:शुल्क अथवा रियायती दरों पर तेज़ गति से चलने वाली इंटरनेट सेवाएं नहीं मिलती हैं।

जबकि सूचना एवं संचार तकनीक की उपलŽधता पूरी तरह से शासकीय नहीं है, ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम इस बात को समझें कि किसी भी तकनीक का विस्तार संघर्षपूर्ण होता है और उस तकनीक के उपयोग की नीति व्यापक तौर पर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्‍तियों को भी परिलक्षित करती हैं (वॉरश्योर, 2003, पेज 35)।

कोई भी तकनीक, जिसका संबंध गरीबी से जुड़े न मिलने वाले लाभों और सामाजिक भेदभाव से हो, को पूरी तरह बाज़ार की श€क्‍तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हो सकता है कि बाज़ार उन लोगों के लिए सेवाएं विकसित करता रहे, जो लोग आर्थिक रूप से मज़बूत हैं। ऐसे में दूरसंचार सेवाएं देने वाले औद्योगिक घराने गरीबों को इंटरनेट से जोडऩे के नाम पर दो अलग-अलग तरह की गति के इंटरनेट उपलब्‍ध कराने के प्रस्ताव देंगे, जिनमें से एक वर्ग वह होगा, जिसके पास तेज़ ब्रॉडबैंड एवं किसी भी वेबसाइट पर तुरंत पहुंचने और उसके पूर्ण उपयोग की सुविधा उपलब्‍ध होगी, जबकि दूसरे वर्ग में आर्थिक रूप से कमज़ोर वे उपयोगकर्ता होंगे, जिनके पास सस्ते मोबाइल फोन, इंटरनेट की धीमी रफ्तार और इंटरनेट उपयोग के मर्यादित अवसर होंगे।

कम आमदनी वाली आबादियों की ज़रूरतें पूरी करने और दूरसंचार सुविधाओं के असंतुलित क्षेत्र को स्थिर करने के लिए विशेषकर शासन की ओर से सहायता और प्रोत्साहन की ज़रूरत है।

डिजिटल स्वीकार्यता के मामले में राष्‍ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन प्रत्येक परिवार में एक कंप्यूटर शिक्षित व्‍यक्‍ति तैयार करने की बात कहता है, किंतु सरकार का ऐसा कोई कार्यक्रम या ऐसी नीति दिखाई नहीं देती, जिसमें उपेक्षित समूहों, महिलाओं और गरीबों की डिजिटल साक्षरता को लक्षित किया गया हो।

महाराष्ट्र राज्य ने (जैसा कि पिछले अध्याय में जि़क्र किया गया है) कक्षा एक के स्कूली पाठ्यक्रम में कंप्‍यूटर सूचना-तकनीक परीक्षण और एमएस-सीआईटी डिजिटल लिटरेसी ट्रेनिंग को शामिल किया गया है। उसने शहरी गरीबों में डिजिटल स्वीकार्यता और सक्षमता निर्माण के लिए $कदम बढ़ाया है और विशेषत: कम आमदनी वाले परिवारों के लिए शुल्क की मा$फी दी है और सार्वजनिक सेवा केंद्रों से शासकीय सेवाओं में आवेदन करने और आमंत्रण पाने जैसी सुविधाएं उपलब्‍ध कराईं। यह एक अच्छी शुरुआत है और अब राज्य को शहरी $गरीबों को, महिलाओं और दिव्यांग व्‍यक्‍तियों को कंप्यूटर एवं इंटरनेट की समान एवं पूर्ण सुविधाएं उपलब्‍ध कराने पर ध्यान देना चाहिए।

डिजिटल समावेश के लिए सिफारिशें

डिजिटल असमानता की बहस पर पुनर्विचार

डिजिटल असमानता को लेकर यह शोध अध्ययन इस मामले में पुनर्विचार की अनुशंसा करता है। डिजिटल तकनीक को लेकर लोग स्वयं ही उससे जुड़ रहे हैं। कहीं भी, किसी भी तरह वे डिजिटल तकनीक को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपना रहे हैं।

सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि डिजिटल असमानता से कैसे बाहर आया जाए, बल्कि इस तकनीक का विस्तार कैसे हो और सामाजिक तौर पर आईसीटी के उपयोग को कैसे प्रोत्साहित किया जाए।

नीति के स्तर पर यह ज़रूरी है कि सरकारें, शहर के योजनाकार और सभ्य समाज इस वास्तविकता को समझें कि सूचनाएं कहां और कैसी हैं या कुछ लोगों को नहीं मिल रही हैं। साथ ही सुविधाविहीन और उपेक्षित लोग सूचनाओं के अभाव में किन्ही अवसरों से मर्यादित हो रहे हैं (गोमेज़, 2015)।

डिजिटल समानता लाने में अवरोध पर हुए शोधों एवं कमज़ोर लोगों की ज़रूरतों के आकलन के बारे में जन-कल्याणकारी कार्यक्रम बनाने एवं चलाने वालों को जानकारी दी जानी चाहिए। $खासतौर से डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों को।

ई-गवर्नेंस और सामाजिक समावेश

ई-गवर्नेंस का उद्देश्य सरकार को नागरिकों के घर के दरवाज़े तक ले जाना है। परंतु यह लोगों को केवल शासकीय संसाधन और ऑनलाइन सेवाएं देने और गवर्नेंस शŽद के आगे ई लगाने से आगे नहीं जाता।

ई-गवर्नेंस में ज़रूरी है कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि सूचनाओं पर सभी का समान अधिकार हो और सभी लोग उन सूचनाओं के उपयोग के समान अवसर पा सकें।

शिक्षा का अभाव, मीडिया तक पहुंचने की असमर्थता और सामाजिक उपेक्षा, ये सब गरीबों को शासकीय संसाधनों और सूचनाओं से दूर रखते हैं। सरकार तक न पहुंच पाने के कारण ऐसे लोग हाशिए पर चले जाते हैं। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत 12 प्रतिशत आबादी ही ऐसी पाई गई, जो कि सरकारी नौकरियों और योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए इंटरनेट का उपयोग कर पा रही थी या किसी तरह का ऑनलाइन कारोबार कर रही थी। यहां तक कि उच्च आय वर्ग के लोगों में भी यह पाया गया कि वे शासकीय नौकरियों या ऑनलाइन कारोबार के लिए इंटरनेट का कोई ज़्यादा उपयोग नहीं करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि केवल व्यवस्था बनाने से ही काम नहीं बनता। गरीब लोगों के मामले में देखा गया कि उपयोगकर्ता सुविधा से मित्रवत नहीं थे या अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के प्रति गंभीर नहीं थे।

इसलिए ज़रूरी है कि ई-गवर्नेंस कार्यक्रमों को सावधानीपूर्वक बनाया जाए, जिससे कि अत्यंत गरीब और एकदम हाशिए पर पड़े हुए व्‍यक्‍ति की आवश्यकताएं भी पूरी हों।

इन कार्यक्रमों को सरल यूज़र इंटरफेस में कम-से-कम शŽब्दों से और बहुभाषी विकल्पों के साथ विकसित किए जाने की आवश्यकता है। ऐसे ई-गवर्नेंस सिस्टम लाए जाएं, जो कमज़ोरों को मदद करें। इस संदर्भ में पुणे में बनाई गईं हेल्प डेस्क एक उदाहरण अच्छा है, जो कि कमज़ोर आय वर्ग के लोगों को 25 प्रतिशत आरक्षण की नीति के तहत स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए मदद करती हैं।

पीसीएमसी का सारथी कार्यक्रम एक अन्य उदाहरण है, जिसके अंतर्गत ऑनलाइन या दूरभाष से शिकायतों को निराकरण के लिए दर्ज कराया जा सकता है। आगे चलकर इसके लिए एक एप्‍लीकेशन विकसित किया जा रहा है। इस तरह की व्यवस्थाएं गरीब लोगों को सूचनाएं दिलाती हैं और उन्हें विकास के लिए मदद एवं प्रोत्साहन देती हैं।

यदि ऐसी व्यवस्थाएं नहीं बन पाईं, तो इनके अभाव में ई-गवर्नेंस कार्यक्रम खत्म हो जाएगा और गरीब तबकों एवं शासन के बीच अवरोध पैदा करेगा। साथ ही यह अवरोध गरीब लोगों को बिचौलियों और दलालों के हवाले कर देंगे और ऐसे लोग डिजिटल इंटरफेस के अभाव की एवज में गरीबों से भाव-ताव करेंगे।

प्रोत्साहन

इंटरनेट और उसके फायदों के बारे में जागरूकता बढ़ाना

सर्वेक्षण में जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि कम आमदनी वाले इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल न करने वाले 41 प्रतिशत लोग आज भी इसके उपयोग को लेकर जागरूक नहीं हैं (कई उपयोगकर्ता इस बारे में अधूरी जानकारी रखते हैं और वे इंटरनेट को लेकर इतने भ्रमित हैं कि उसे फेसबुक अथवा वॉट्सएप के रूप में जानते हैं)। लोगों को ऑनलाइन बनाने के प्रोत्साहन को विकसित करने के लिए समुदायों को इंटरनेट के फायदों और उसकी सामयिकता को समझना होगा।

साधारण जागरूकता से आगे बढ़कर इंटरनेट उपयोग, खासतौर से विशिष्ट समुदायों के लिए ठोस उदाहरण विकसित करने होंगे, जो कि उन लोगों के लिए इंटरनेट की महžत्‍व प्रदर्शित करने में ज़्यादा कामयाबी हासिल करा सकें।

सामयिक और स्थानीय कंटेंट एवं सेवाओं का निर्माण (बिल्डिंग रिलेवेंट लोकल कंटेंट एंड सर्विसेस)-

गैर-उपयोगकर्ताओं में इंटरनेट जानने वाले ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या है, जो कि ऑनलाइन होने की इच्छा रखते हैं। 73 फीसदी लोगों ने बताया कि वे भविष्य में ऑनलाइन होना चाहेंगे और 78 फीसदी लोगों ने कहा कि इंटरनेट बुनियादी सुविधाओं की तरह ज़रूरी है। यद्यपि इससे संकेत मिलता है कि गैर-उपयोगकर्ताओं के बीच ऑनलाइन होने को लेकर अच्छा उत्साह है, जो जानते हैं कि इंटरनेट €या है, फिर भी 22.5 प्रतिशत गैर-उपयोगकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि इंटरनेट की ज़रूरत होगी। जिसका मतलब यह है कि इंटरनेट उनके लिए ऐसी चीज़ नहीं है, जो कि उनके लिए ज़रूरी हो। इसलिए यह उतना ही ज़रूरी है कि उपेक्षित या हाशिए पर पड़ी आबादी के लिए ऐसे स्थानीय एवं सामयिक कंटेंट का निर्माण किया जाए, जो उनके जीवनोपयोगी, स्वास्थ्य, मकान, शिक्षा, व्‍यक्‍तिगत आर्थिक सक्षमता, मूलभूत सुविधाओं एवं अवसरों आदि के संबंध में उन्हें उन भाषाओं में सूचनाएं प्रदान करें, जिन्हें वे अच्छी तरह से समझते हैं।

स्थानीय भाषाओं में सामग्री (कंटेंट) का अभाव विभिन्न अशिक्षित समुदायों के बीच इंटरनेट के अनेक उपयोगों के लिए बाधक हो जाता है। पीएमसी (पुणे महानगरपालिका) की आधिकारिक वेबसाइट केवल अंग्रेज़ी भाषा में उपलब्‍ध है (जबकि उसके साथ गूगल अनुवाद का एक भी विकल्‍प नहीं है), दूसरी तरफ पीसीएमसी (पिंपरी-चिंचवाड़ महानगर पालिका अंग्रेज़ी और मराठी दोनों इंटरफेस उपलब्‍ध कराती हैं)। पुणे महानगर पालिका की वेबसाइट पर मराठी भाषा में कई प्रारूप पीडीएफ फॉर्मेट में उपलब्‍ध हैं, किंतु इन तक पहुंचने के लिए अंग्रेज़ी लिंक से होकर जाना अनिवार्य है। भाषा का यह विशिष्ट अवरोध 35 वर्ष से अधिक के आयु समूहों में देखा गया, जो कि कम आयु के उन लोगों की तुलना में अंग्रेज़ी अच्छी तरह नहीं समझते, जिन्होंने प्राथमिक स्तर तक अंग्रेज़ी को माध्यम के रूप में चुना था या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ा था। कम आयु के उपयोगकर्ताओं ने भाषा के इस अवरोध पर काम करते हुए खुद को रोमन लिपि में टे€स्ट पढऩे के योग्य बना लिया और वे मराठी, हिंदी तथा अन्य भाषाओं में सर्च करना भी सीख गए।

सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने के तरीके

46.4 प्रतिशत गैर-उपयोगकर्ताओं ने कहा कि इंटरनेट के नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं और इससे भी आगे 61.9 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने माना कि इंटरनेट के बुरे प्रभाव हो सकते हैं। जबकि उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट के दुरुपयोग और अवास्तविक तथ्यों के संदर्भ में जानकारी है, अध्ययन किए गए इलाकों में इंटरनेट के प्रति भय देखा गया, खासतौर से महिलाओं में। इसी वजह से डिजिटल असमानता और कंप्यूटर के उपयोग में लिंग भेद को ताकत मिलती है।

इंटरनेट के उपयोग को सामाजिक तौर पर आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय समुदायों में और बड़े पैमाने पर जागरूकता निर्मित किए जाने की ज़रूरत है, ताकि लोग सुरक्षित एवं जि़म्मेदार ढंग से ऑनलाइन हों।

इंटरनेट उपयोग के लिए परिवार एवं समुदाय का सहयोग ज़रूरी है। सामाजिक तौर पर इंटरनेट उपयोग के लिए मदद खासतौर से महिलाओं को प्रोत्साहित करेगी, साथ ही इंटरनेट उपयोग के तरीके एवं विषय और बढ़ जाएंगे।

पहुंच या जुड़ाव / अधोसंरचना

कंप्यूटर अथवा इंटरनेट से जुड़ाव में उपकरण एवं चैनल शामिल हैं। जबकि कंप्यूटर और स्मार्टफोन की कीमतें गिर रही हैं, अपेक्षित समुदायों, विशेषकर महिलाओं और जो कि अत्यंत निर्धन समुदायों से हैं, आज भी ऐसे फीचर फोन खरीदने में असमर्थ हैं, जो कि इंटरनेट सेवा दे सकते हैं।

इस समस्या को हल करने का एक तरीका यह हो सकता है कि कमज़ोर आयवर्ग के लोगों को कमाओ और सीखो कार्यक्रम के अंतर्गत भागीदार बनाया जाए और विभिन्न स्तरों का आईसीटी प्रशिक्षण सफलता से पूरा करने पर उन्हें निशुल्क/अनुदान पर उपकरण दिए जाएं। दृष्टिबाधित और अल्प या अशिक्षित व्‍यक्‍तियों को कंप्यूटर सीखने में मदद करने के लिए बोलने वाले आलेख (टे€क्स्ट टू स्पीच) और आवाज़ से पहचाने जाने वाले सॉफ्टवेयर उपलब्‍ध कराए जाएं।

इसके अलावा इस समस्या से निपटने के लिए एक बेहतर और आसान तरीका यह भी हो सकता है कि गरीब आबादी के बीच थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सार्वजनिक कंप्यूटर जुड़ाव केंद्र स्थापित किए जाएं। इन केंद्रों पर तेज़ गति की इंटरनेट सेवा रियायती दरों पर उपलब्‍ध कराई जाए। ऐसे केंद्र विभिन्न स्तरों पर समुदायों की आवश्यकताओं को विभिन्न प्रकार से पूरा कर सकें-

  1. लोगों को वाजिब दाम पर कंप्यूटर से जुडऩे की सेवाएं उपलब्‍ध कराना, जो कि आज ऑफलाइन है, €क्‍योंकि उनके पास कंप्यूटर इन्फ्रास्ट्र€चर नहीं है और वे आर्थिक रूप से उसे जुटाने में असमर्थ हैं।
  2. महिलाओं को कंप्यूटर से जुडऩे के अवसर उपलब्‍ध कराना जिनके पास इन्फ्रास्ट्र€चर नहीं है और न ही उन्हें कंप्यूटर पर काम करने की आज़ादी है। इन महिलाओं के पास दूर-दराज़ स्थानों पर व्यावसायिक रूप से चलाए जा रहे कंप्यूटर केंद्रों पर पहुंचने के लिए आर्थिक सक्षमता भी नहीं है।
  3. इन समुदायों को वे सुविधाएं दी जाएं, जिनके लिए वे सायबर कैफे पर निर्भर हैं, जैसे कि जटिल आवेदन-पत्रों को भरना और उन्हें अपलोड करना, डाटा डाउनलोड करना और सुरक्षित ऑनलाइन लेन-देन करना आदि।
  4. इंटरनेट का स्वतंत्र एवं पूर्ण अनुभव दिलाना बजाय इसके कि उन्हें टेलीकॉम प्रोवाइडरों से लो-कॉस्ट डाटा उपभोक्ता होने के कारण मर्यादित सेवाएं प्राप्त होती रहें।
  5. नए उपयोगकर्ताओं को ढूंढ़कर तैयार करना, जो कि इंटरनेट के आसपास अपना भविष्य की तलाश कर रहे हैं ओर लोगों को ई-गवर्नेंस सेवाओं से सीधे जोडऩा बजाय इसके कि उन्हें सार्वजनिक सेवा केंद्रों पर जाना पड़े।

ऐसे केंद्र व्यावसायिक संस्थानों, शासन, शैक्षणिक संस्थानों और स्वैच्छिक संगठनों द्वार संचालित किए जा सकते हैं। महाराष्ट्र में पुस्तकालयों के संचालनालय (डायरे€टोरेट ऑफ लाइब्रेरीज़), एक ऐसा संगठन है, जिसके द्वारा सार्वजनिक पुस्तकालयों का संख्यात्मक विस्तार कर वहां डिजिटल इन्फ्रास्ट्र€चर एवं डिजिटल शिक्षा पाठ्यक्रम एवं कार्यक्रम उपलब्‍ध कराए जा सकें।

ऐसी आबादियों के बीच कंप्यूटर जुड़ाव केंद्र की भौगोलिक स्थिति उसकी सफलता का आधार होगी। यह केवल इसलिए नहीं कि ये स्थान महिलाओं के इंटरनेट से जुडऩे के लिए सुलभ होंगे, बल्कि इसलिए भी कि इंटरनेट तकनीक को सामाजिक सहयोग से अपनाने एवं सामुदायिक मालकियत के भाव को मज़बूत बनाने में सहायक होंगे। इन केंद्रों की सफलता में प्रशिक्षकों एवं कंप्यूटर उपयोगकर्ता तैयार करने वालों की उपस्थिति अहम होगी, जो कि समुदाय के लोगों को कंप्यूटर पर सूचनाओं एवं सेवाओं को प्राप्त करने के बारे में मार्गदर्शन देंगे। ये सार्वजनिक जुड़ाव केंद्र कालांतर में कम्युनिटी मीडिया प्रॉड€क्शन के केंद्र बन जाएंगे।

उपयोगकर्ताओं की क्षमता

यह बहुत साधारण है अगर अपनी इच्‍छा से यह सोचा जाए कि एक बार इंटरनेट से जुड़ने के बाद आम लोग इस साधन का जरूरत के हिसाब से सार्थक उपयोग करने में सक्षम होंगे।

‘अगर, जैसा कि कास्‍टेल्‍स कहते हैं, इंटरनेट हमारे जीवन की बुनावट है और इस बुनावट के भीतर रहने वाले लोगों को अपनी मर्जी की जीवनशैली में स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करनी हो तो उन्‍हें मीडिया की नई साक्षरता हासिल करनी ही होगी।’ (मानसेल, 2002)

मीडिया की नई साक्षरता केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता से कहीं ज्‍यादा चीजों पर जोर देती है। हां ये जरूर है कि एप्‍स, टचस्‍क्रीन, नेविगेशन और दृश्‍य-श्रव्‍य सामग्री के ज्‍यादा उपयोग को बढ़ावा देने वाली वेबसाइटें अल्‍पशिक्षित उपयोगकर्ताओं लिए इंटरनेट के इस्‍तेमाल को असान बना रही हैं। लेकिन कंप्‍यूटर सूचना तकनीक के कौशल और शिक्षा ही भविष्‍य में यह तय करेगी कि लोग इंटरनेट का किस तरह उपयोग करते हैं और इससे क्‍या फायदा ले पाते हैं। केवल तकनीक तक पहुंच पर ध्‍यान केंद्रित करना, जबकि उपयोगकर्ताओं की बराबरी की क्षमता पर ज्‍यादा ध्‍यान न दिया जा रहा हो, एक और विभाजन की दिशा में उन्‍मुख होगा, जिसमें वे लोग जिनके पास क्षमता कम है, वे इंटरनेट का उपयोग पूरी तरह से नहीं कर पाएंगे, जबकि सूचनाप्रद अर्थतंत्र में संपन्‍न व सक्षम तबका इसका बेहतर उपयोग कर नए ज्ञान के सर्जन और रचना में कहीं आगे निकल जाएगा।

कंप्‍यूटर सूचना तकनीक के कौशल और शिक्षा की अनुपस्‍थिति हाशिए पर खड़े समुदाय के लिए इंटरनेट के उपयोग में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक हैं। इस सर्वेक्षण में 27 प्रतिशत गैर उपयोगकर्ताओं ने कहा कि वे इसलिए ऑनलाइन नहीं होते, क्‍योंकि उन्‍हें यह नहीं मालूम कि इंटरनेट का किस तरह उपयोग करना है। गैर उपयोगकर्ताओं में 16.2 प्रतिशत ने इसके पीछे शिक्षा की कमी को कारण बताया। हालांकि, उन लोगों ने, जो इंटरनेट का पहले ही इस्‍तेमाल करते रहे हैं कंप्‍यूटर सूचना तकनीक के कौशल की कमी को मुखरता के साथ रुकावट नहीं बताया, लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि ऊंची शिक्षा प्राप्‍त उपयोगकर्ताओं में इस बात की संभावना ज्‍यादा रहती है कि वे इंटरनेट का उपयोग केवल सोशल मीडिया से आगे बढ़कर शिक्षा और नौकरी तलाशने के लिए भी करें।

महाराष्‍ट्र सरकार द्वारा एमएस-सीआईटी के माध्‍यम से उपलब्‍ध कराए जा रहे कंप्‍यूटर सूचना तकनीक के तीन माह के कोर्स को सभी के लिए एक नाप में देखने जैसा कहा जा सकता है, जो कि पर्याप्‍त नहीं है। छोटे-छोटे वर्कशॉप और प्रशिक्षण, जिसका समय लचीला हो और इसमें दृश्‍य-श्रव्‍य माध्‍यमों से शिक्षा दी जाती हो और जो समाज के वंचित तबकों को उनके घर के पास ही उपलब्‍ध हो सके ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को इंटरनेट के उपयोग के लिए प्रेरित करेगा। ये कार्यशालाएं कई स्‍तरों पर आयोजित की जानी चाहिए, जिसकी शुरुआत उस मूलभूत कार्यशाला से हो, जिसमें कंप्‍यूटर से असुविधा से उबरना सिखाया जाए। ये कार्यशालाएं आखिर में उस बिंदु पर खत्‍म हो सकती हैं, जिसमें उपयोगकर्ताओं को यह सिखाया जाए कि इंटरनेट पर उपलब्‍ध सूचनाओं के स्रोत की विश्‍वसनीयता का आंकलन किस तरह करें, साथ ही यह भी बताया जाए कि मल्‍टीमीडिया के साधनों का उपयोग कर वे अपने लिए सामग्री किस तरह से तैयार करें।

स्‍कूल स्‍तर पर कंप्‍यूटर सूचना तकनीक की शिक्षा की गुणवत्‍ता में सुधार होना चाहिए। इसके लिए ढांचागत व्‍यवस्‍थाएं अत्‍याधुनिक और पूरी तरह से कार्यशील होनी चाहिए। बच्‍चों को कक्षा 1 से इसका व्‍यावहारिक प्रशिक्षण मिले, प्रशिक्षकों को कंप्‍यूटर सूचना तकनीक का कौशल विकसित करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। सरकार द्वारा संचालित ई-लर्निंग अकादमियों के बच्‍चों और बाकी स्‍कूलों के बच्‍चों में कंप्‍यूटर सूचना तकनीक के ज्ञान को लेकर बड़ी असमानता है। यह असमानता उन सरकारी स्‍कूलों में भी नजर आती है, जहां जन संगठन ई-लर्निंग और कंप्‍यूटर सूचना तकनीक का प्रशिक्षण देते हैं। ऐसे में सभी स्‍कूलों को ई-लर्निंग अकादमियों में तुरंत बदलना जरूरी है, अन्‍यथा कमजोर आय वर्ग के बच्‍चे डिजिटल तकनीक के मामले में नुकसान में रहेंगे, क्‍योंकि कंप्‍यूटर सूचना तकनीक से घर में उनका वास्‍ता नहीं पड़ता और स्‍कूल में भी वे इस तकनीक की केवल औपचारिक शिक्षा ही पाते हैं।

ENDNOTES

1. The Universal Service Obligation Fund of India aims to provide widespread and non-discriminatory access to quality ICT services at affordable prices to all people in rural and remote areas (http://www.usof.gov.in/usof-cms/home.jsp)

2. Virtual Network Operators (VNO) are telecom service providers that rely on the network of other telecom companies to provide services to consumers. A VNO buys bulk talktime and bandwidth from an operator and then sells it to users. It can provide any or all the services that are being provided by the network operator

3. Bharat Sanchar Nigam Limited is one of the largest and leading public sector units providing a range of telecom services in India

4. Bharat Broadband Network Limited set up under the Companies Act by Government of India has been mandated to create the National Optical Fibre Network (NOFN) in India

5. RailTel Corporation of India Limited is a public sector undertaking which extends broadband and application services to the masses through the RailWire platform